
बाहर बारिश अब धीमी हो चुकी थी, लेकिन आसमान में बिजली अब भी रुक-रुक कर कड़क रही थी, जिससे कमरे की दीवारों पर डरावने साये बन रहे थे। अवनि उस विशाल कमरे के कोने में रखे मखमली सोफे पर सिमटकर बैठी थी। उसका रो-रोकर बुरा हाल था। उसने अपनी नज़रें कमरे की बड़ी सी फ्रेंच विंडो की तरफ घुमाईं और जो देखा, उसने उसकी बची-कुची उम्मीद भी खत्म कर दी।
नीचे बगीचे में हर दस कदम पर हथियारों से लैस गार्ड्स पेट्रोलिंग कर रहे थे। ऊँची दीवारों पर कटीली तारें लगी थीं और फ्लड लाइट्स की रोशनी चप्पे-चप्पे को खंगाल रही थी। अवनि को समझ आ गया कि यह कोई घर नहीं, बल्कि एक 'हाई-सिक्योरिटी जेल' है। यहाँ से परिंदा भी पर नहीं मार सकता था, और वह तो बस एक निहत्थी लड़की थी।
तभी, दरवाजे के लॉक खुलने की आवाज़ आई— कड़क। अवनि का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
पृथ्वीराज अंदर आया। उसने अपनी ब्लैक शर्ट उतारकर अब एक ग्रे कलर की टी-शर्ट पहन ली थी, जिसमें उसकी मस्कुलर बॉडी और भी साफ़ झलक रही थी। उसके हाथ में खाने की चाँदी की प्लेट थी। उसने कमरे का दरवाज़ा पैर से बंद किया और सीधे अवनि की तरफ बढ़ा।
"खाना खा लो," उसने प्लेट सेंटर टेबल पर रखते हुए बहुत ही शांत, पर भारी आवाज़ में कहा। प्लेट में लज़ीज़ शाही पनीर और गर्मागर्म रोटियाँ थीं, जिनकी खुशबू पूरे कमरे में फैल गई थी।
अवनि ने प्लेट की तरफ देखा तक नहीं। उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया और सिसकते हुए बोली, "मुझे कुछ नहीं खाना। मुझे बस घर जाना है... प्लीज, मुझे जाने दीजिये।"
पृथ्वीराज की आँखों में एक पल के लिए कड़वाहट आई। वह धीरे से अवनि के पास झुका। "मैंने तुमसे सवाल नहीं किया अवनि, मैंने ऑर्डर दिया है। चुपचाप खाना खत्म करो।"
"नहीं खाऊंगी!" अवनि इस बार चिल्लाई। डर अब गुस्से में बदल रहा था। "आप मुझे जबरदस्ती यहाँ ले आए, मेरे डैड को डराया... मैं आपके हाथ का पानी तक नहीं पियूंगी!"
पृथ्वीराज का चेहरा एकदम से तमतमा उठा। उसने पलक झपकते ही अवनि की बांह पकड़ी और उसे सोफे से उठाकर सीधे दीवार से सटा दिया। अवनि के मुंह से एक चीख निकल गई। पृथ्वीराज की आंखों में खौफनाक गुस्सा था।
"अपनी आवाज़ नीचे रखो अवनि," उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, पर उसकी टोन किसी गरज से कम नहीं थी। उसने अपना दूसरा हाथ अवनि के सिर के पास दीवार पर ज़ोर से मारा— धप! "तुम्हारी हर नादानी की कीमत तुम्हारी फैमिली चुकाएगी। अगर तुमने खाना नहीं खाया और खुद को बीमार किया, तो कल तुम्हारे भाई को कॉलेज पहुँचने से पहले ही मेरे आदमी उठा लेंगे। क्या तुम यही चाहती हो?"
अवनि की आँखों से आँसू झरने लगे। वह कांपती हुई आवाज़ में बोली, "आप... आप इतने गिरे हुए कैसे हो सकते हैं?"
पृथ्वीराज के चेहरे पर एक डार्क स्माइल आ गई। उसने अवनि के चेहरे के पास आकर गहरी सांस ली। "मैं अपने जुनून को पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता हूँ।" उसने उसे धीरे से छोड़ा और प्लेट की ओर इशारा किया।
मजबूरी में, अवनि लड़खड़ाते कदमों से टेबल तक पहुँची। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने जैसे-तैसे एक निवाला गले से नीचे उतारा। उसे हर बाइट जहर जैसी लग रही थी। पृथ्वीराज वहीं खड़ा उसे ऐसे देख रहा था, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार पर नज़र रखता है।
जब अवनि ने आधा खाना खत्म कर लिया, तो पृथ्वीराज उसके पास आया। उसने अपनी जेब से एक छोटा सा मखमली बॉक्स निकाला। उसने बिना कुछ कहे अवनि का बायां हाथ पकड़ा। अवनि ने हाथ खींचने की कोशिश की, पर उसकी पकड़ लोहे जैसी सख्त थी।
उसने बॉक्स खोला और एक बड़ी सी हीरे की अंगूठी अवनि की रिंग फिंगर में पहना दी। हीरे की चमक इतनी तेज थी कि अवनि की आँखें चौंधिया गईं।
"यह अंगूठी सिर्फ एक ज़ेवर नहीं है अवनि," उसने उसके हाथ को अपने होंठों के करीब लाकर चूमते हुए कहा। अवनि को उसके टच से घिन और डर दोनों महसूस हुए। "यह इस बात का सबूत है कि तुम अब पूरी तरह मेरी हो। दुनिया का कोई भी इंसान अब तुम्हें मुझसे छीन नहीं सकता।"
अवनि ने उसकी आँखों में देखा। वहां उसे प्यार नहीं, बल्कि एक ऐसा Obsession दिखा जो किसी को भी तबाह कर सकता था। वह प्यार कम और 'मालिकाना हक' ज्यादा था।
पृथ्वीराज दरवाजे की तरफ बढ़ा, पर बाहर निकलने से पहले रुका। "कल सुबह जल्दी तैयार हो जाना। पार्लर वाली टीम सुबह 6 बजे यहाँ पहुँच जाएगी।"
अवनि ने चौंक कर पूछा, "क्यों?"
पृथ्वीराज ने मुड़कर उसे देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। "कल शहर की सबसे बड़ी पार्टी है। और मैं दुनिया को बताना चाहता हूँ कि पृथ्वीराज चौहान की पत्नी कौन है। कल पूरा शहर तुम्हारे कदमों में होगा, लेकिन याद रखना... तुम सिर्फ मेरे कंट्रोल में होगी।"
वह बाहर निकल गया और दरवाजा फिर से बाहर से लॉक हो गया। अवनि बिस्तर पर गिरकर फूट-फूट कर रोने लगी। कल का दिन उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान होने वाला था। उसे अब पूरी दुनिया के सामने उस इंसान की 'प्रॉपर्टी' बनकर खड़ा होना था, जिससे वह सबसे ज्यादा नफरत करती थी।

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