
कुछ देर बाद, वह ब्लैक मर्सिडीज एक विशाल लोहे के गेट के सामने रुकी, जो किसी पुराने किले के एंट्रेंस जैसा लग रहा था। गेट के दोनों तरफ हथियारबंद गार्ड्स खड़े थे, जिन्होंने पृथ्वीराज की गाड़ी देखते ही अपना सिर झुका लिया। बारिश अब और तेज हो चुकी थी। जैसे ही गाड़ी अंदर गई, अवनि की आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने एक आलीशान, लेकिन बेहद डरावनी दिखने वाली पुरानी हवेली खड़ी थी। उसकी गॉथिक नक्काशी और ऊँची मीनारें रात के अंधेरे में किसी सोए हुए राक्षस जैसी लग रही थीं।
गाड़ी रुकते ही एक नौकर छाता लेकर आया और उसने दरवाजा खोला। पृथ्वीराज ने अवनि का हाथ पकड़ा और उसे लगभग घसीटते हुए गाड़ी से बाहर निकाला। अवनि के पैर कांप रहे थे। हवेली के अंदर कदम रखते ही एक ठंडी सी सिहरन उसके शरीर में दौड़ गई। इंटीरियर बहुत महंगा था—ऊँची छतें, मखमली कालीन और दीवार पर लटके पूर्वजों के बड़े-बड़े पोर्ट्रेट्स, जिनकी आँखें मानो अवनि का पीछा कर रही हों।
पृथ्वीराज उसे सीधे सेकंड फ्लोर के एक बड़े कमरे में ले गया। वहां पहुँचते ही उसने अवनि का हाथ छोड़ दिया। अवनि लड़खड़ा कर दीवार के पास जा खड़ी हुई।
"यह आज से तुम्हारा कमरा है," पृथ्वीराज ने कमरे की चाबी मेज पर पटकते हुए कहा। उसकी आवाज़ में अब भी वही डोमिनेटिंग टोन थी।
अवनि ने चारों ओर देखा। कमरा किसी क्वीन के सुइट जैसा था—किंग साइज बेड, लग्जरी झूमर और एक बड़ी सी वॉक-इन क्लोसेट। लेकिन अवनि को वहां घुटन महसूस हो रही थी। उसे लगा जैसे वह एक 'सुनहरे पिंजरे' में कैद हो गई है।
पृथ्वीराज उसकी तरफ बढ़ा और अपनी शर्ट के ऊपर के दो बटन खोलते हुए एक कागज उसकी तरफ बढ़ाया। "ये इस घर के रूल्स हैं अवनि। इन्हें अच्छे से पढ़ लो और अपने दिमाग में बिठा लो।"
अवनि ने कांपते हाथों से कागज लिया। उसमें कई रूल्स लिखे थे, लेकिन सबसे ऊपर बोल्ड लेटर्स में लिखा था— "तुम मेरी इजाजत के बिना इस कमरे की दहलीज पार नहीं करोगी।"
"क्या मैं... मैं यहाँ कैदी हूँ?" अवनि ने हिम्मत जुटाकर फुसफुसाते हुए पूछा। उसकी आवाज़ सिसकियों से भारी थी।
पृथ्वीराज उसकी तरफ एक कदम और बढ़ा। उसने अवनि के चेहरे के करीब झुककर सीधे उसकी आँखों में देखा। "तुम मेरी वाइफ हो अवनि, और मेरी सबसे कीमती अमानत भी। अमानतों को संभालकर तिजोरी में रखा जाता है, सड़कों पर खुला नहीं छोड़ा जाता।"
अवनि का मन हुआ कि वह अभी भाग जाए। उसने दरवाजे की तरफ देखा, लेकिन पृथ्वीराज जैसे उसका माइंड पढ़ रहा था। वह धीमे से हंसा, जो हंसी अवनि के कानों में चुभ रही थी।
"भागने की सोचना भी मत," वह उसकी ठुड्डी को अपनी उंगलियों से सहलाते हुए बोला। "मेरी पहुँच तुम्हारी सोच से कहीं ज्यादा दूर है। अगर इस गेट के बाहर कदम भी रखा, तो याद रखना कि तुम्हारे पिता का घर जलने में सिर्फ एक फोन कॉल का वक्त लगेगा।"
अवनि का दिल बैठ गया। वह समझ चुकी थी कि वह पूरी तरह फंस चुकी है। पृथ्वीराज ने उसे कमरे के एक कोने में ले जाकर बड़ी-बड़ी अलमारियां खोलीं। वहां दुनिया के सबसे महंगे ब्रांड्स के कपड़े, जूते और गहने भरे पड़े थे।
"ये सब तुम्हारे लिए है," पृथ्वीराज ने एक हीरा जड़ा हुआ नेकलेस हाथ में लेते हुए कहा। "तुम्हें जो चाहिए, यहाँ मिलेगा। मैं तुम्हें दुनिया की हर ख़ुशी दूंगा, लेकिन बदले में मुझे सिर्फ एक चीज चाहिए—तुम।"
अवनि ने पीछे हटते हुए कहा, "मुझे ये सब नहीं चाहिए। मुझे बस मेरे घर जाने दीजिये।"
पृथ्वीराज का चेहरा अचानक सख्त हो गया। उसकी आँखों का वह जुनून अब साफ़ दिख रहा था। उसने अवनि को कमर से पकड़कर अपनी ओर खींचा, जिससे वह उसके मजबूत सीने से जा टकराई। अवनि की सांसें तेज चलने लगीं। उसे उसके शरीर की गर्मी और उस महंगे परफ्यूम की स्मेल महसूस हो रही थी।
उसने अवनि के कान के पास झुककर अपनी भारी आवाज़ में कहा, "आज से तुम मेरी 'प्राइवेट प्रॉपर्टी' हो अवनि। इस पर सिर्फ पृथ्वीराज चौहान का हक है। चाहे प्यार से रहो या नफरत से, रहना यहीं होगा।"
अवनि बुरी तरह सहम गई। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। पृथ्वीराज ने अपना हाथ उसके गालों पर फेरा और फिर धीरे-धीरे उसकी गर्दन तक ले गया। अवनि को लगा जैसे उसका दम घुट जाएगा। उसके छूने के अंदाज़ में एक अजीब सा पागलपन था।
उसने अवनि को धीरे से छोड़ दिया और कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजे पर पहुँचकर वह रुका और पीछे मुड़कर देखा। "तैयार हो जाओ अवनि। डिनर हम साथ करेंगे। और हाँ... चेहरे पर ये मातम मत रखना, समझी ना ।"
उसने बाहर जाकर दरवाजा बंद कर दिया और ताला लगने की आवाज़ अवनि के दिल पर चोट की तरह लगी। वह घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसे अहसास हो गया था कि इस माफिया किंग के जाल से निकलना अब नामुमकिन है।

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